चिरमिरी : कोयलांचल चिरमिरी के इतिहास के सबसे बड़े निवेश घोटाले का मुख्य सूत्रधार राजेश कुमार गुप्ता अब केवल एक ठग नहीं, बल्कि ‘मनोवैज्ञानिक अपराधी’ की तरह व्यवहार कर रहा है। करोड़ों की ठगी करने के बाद खुद फरार है, लेकिन उसके प्यादे (मीडिएटर्स) आज भी मैदान में सक्रिय हैं, जो डूबते हुए निवेशकों को झूठी उम्मीदों की अफीम चटा रहे हैं। कभी जमीन बेचने का झांसा, तो कभी सोना गिरवी रखने का नाटक—राजेश गुप्ता का यह मायाजाल केवल समय काटने की एक सोची-समझी साजिश है।
30 मई की डेडलाइन: क्या यह केवल ‘टाइम-पास’ का हथियार है?
सूत्रों के मुताबिक, राजेश गुप्ता ने चिरमिरी के कई निवेशकों को 30 मई तक का समय दिया है। सवाल यह उठता है कि जो व्यक्ति अपने घर से गायब है, जिसका फोन बंद है, वह 30 मई को अचानक कौन सा चमत्कार करने वाला है? स्थानीय जानकारों का कहना है कि यह तारीख केवल इसलिए दी गई है ताकि लोग उग्र न हों और पुलिस के पास न जाएं। यह ‘तारीख पे तारीख’ का खेल आरोपी को अपनी संपत्ति ठिकाने लगाने के लिए पर्याप्त समय दे रहा है।
मीडिएटर्स की फौज: आवाज दबाने की कोशिश
हैरानी की बात यह है कि आरोपी फरार है, लेकिन चिरमिरी में उसके कुछ खास ‘बिचौलिए’ और ‘मीडिएटर्स’ आज भी घूम रहे हैं। इनका काम उन पीड़ितों को डराना या बहलाना है जो पुलिस के पास जाकर केस दर्ज कराने की सोच रहे हैं।
रणनीति: इन मीडिएटर्स द्वारा तर्क दिया जा रहा है कि— “अगर केस करोगे तो राजेश जेल चला जाएगा और तुम्हारा पैसा कभी नहीं मिलेगा।” * हकीकत: यह कानूनी कार्यवाही से बचने का एक पुराना पैंतरा है। ये बिचौलिए दरअसल आरोपी के मददगार हैं, जो पीड़ितों को मानसिक रूप से बंधक बना रहे हैं।
दिसंबर 2026 का ‘फर्जी एग्रीमेंट’— कानूनी शिकंजे से बचने की ढाल
राजेश गुप्ता ने चालाकी की हद पार करते हुए कई लोगों के साथ ‘स्टाम्प पेपर’ पर एग्रीमेंट किया है कि वह दिसंबर 2026 तक करोड़ों की राशि ब्याज समेत लौटा देगा। यह एग्रीमेंट रद्दी के टुकड़े के सिवाय कुछ नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि राजेश इस मामले को ‘क्रिमिनल फ्रॉड’ की जगह ‘सिविल डिस्प्यूट’ (लेन-देन का मामला) बनाना चाहता है, ताकि पुलिस उसे गिरफ्तार न करे।
पैतृक गांव मंजा में ‘रिश्तेदारी’ का ड्रामा
जब पीड़ितों की टोली राजेश की तलाश में उसके पैतृक गांव मंजा (सरभोका) पहुंच रही है, तो वहां एक अलग ही पटकथा (Script) तैयार मिलती है। घर वालों और आसपास के रिश्तेदारों का अब एक ही रटा-रटाया जवाब है:
“राजेश से हमारा अब कोई रिश्ता नहीं है, वह कहाँ है हमें नहीं पता।”
यह वही परिवार और रिश्तेदार हैं जो राजेश की कथित ‘अमीरी’ के समय उसके साथ खड़े थे, लेकिन अब कानूनी आंच आते ही सबने पल्ला झाड़ लिया है। क्या यह वाकई अलगाव है या फिर पुलिस को गुमराह करने की सामूहिक रणनीति?
प्रशासन की चुप्पी पर उठते सवाल
करोड़ों के इस हेरफेर में जहाँ सैकड़ों परिवारों की गाढ़ी कमाई दांव पर लगी है, वहां पुलिस और प्रशासन की सुस्ती आरोपी के हौसले बुलंद कर रही है। आरोपी फरार है, फर्जी बॉन्ड बांटे जा रहे हैं, और खुलेआम मीडिएटर्स लोगों को धमका/बहला रहे हैं, फिर भी कड़े एक्शन का इंतजार है।
कटाक्ष: कब जागेगा सिस्टम?
राजेश गुप्ता जैसे लोग यह जानते हैं कि भारत में न्याय की चक्की धीरे चलती है, और इसी का फायदा उठाकर वह कभी ‘जमीन’ का लॉलीपॉप दे रहा है तो कभी ‘सोने’ का। लेकिन चिरमिरी की जनता को समझना होगा कि ‘भगोड़ा’ कभी भुगतान नहीं करता, वह केवल गुमराह करता है। 30 मई हो या दिसंबर 2026, बिना कानूनी चाबुक के ये ठग केवल तारीखें बदलेंगे, आपकी तकदीर नहीं।
सावधान रहें: किसी भी एग्रीमेंट या झांसे में आने से पहले पुलिस को सूचना दें। आपकी चुप्पी ही राजेश गुप्ता की सबसे बड़ी ताकत है।
चिरमिरी का ‘नटवरलाल’: फरारी के बीच राजेश गुप्ता का ‘तारीख पे तारीख’ खेल, आखिर कब तक ठगी जाएगी कोयलांचल की जनता?
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