पत्थलगांव : छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के गृह जिले जशपुर के पत्थलगांव से एक ऐसी खौफनाक और विचलित करने वाली घटना सामने आई है, जिसने राज्य की कानून-व्यवस्था और प्रेस की स्वतंत्रता पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। पत्थलगांव थाने के भीतर, पुलिस बल और वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी एक पत्रकार को बेरहमी से पीटा गया। यह घटना न केवल एक पत्रकार पर हमला है, बल्कि कानून के रखवालों की नाक के नीचे अपराधियों के बेखौफ हौसलों की गवाही देती है।
क्या है पूरा मामला? क्यों निशाने पर आए पत्रकार?
मिली जानकारी के अनुसार, पत्रकार अमित पांडेय पिछले कुछ समय से क्षेत्र में सक्रिय भू-माफियाओं और रसूखदारों के खिलाफ लगातार खोजी पत्रकारिता कर रहे थे। उन्होंने एक असहाय परिवार की बेशकीमती जमीन को फर्जी दस्तावेजों के सहारे हड़पने और विरोध करने पर मूल भू-स्वामी की संदिग्ध मौत (हत्या के आरोप) से जुड़े मामले का पर्दाफाश किया था।
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि इसी सच को उजागर करना अमित पांडेय के लिए मुसीबत बन गया। रसूखदारों और भू-माफियाओं ने अपनी साख बचते न देख सीधे पत्रकार को ही रास्ते से हटाने और उनकी आवाज को दबाने की साजिश रच डाली। पीड़ित परिवार का कहना है, “हम पिछले डेढ़ दशक से इस तंत्र के आगे घुट-घुट कर जी रहे थे। अमित पांडेय की खबरों ने हमें न्याय की उम्मीद दी थी, लेकिन आज सच दिखाने की कीमत उन्हें अपना खून बहाकर चुकानी पड़ी।”
थाने के भीतर ‘तांडव’ और पुलिस की भूमिका पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे स्याह पहलू यह है कि यह वारदात किसी सुनसान सड़क पर नहीं, बल्कि पत्थलगांव थाने के भीतर अंजाम दी गई। आरोपों के मुताबिक, एसडीओपी ध्रुवेश जायसवाल की मौजूदगी में सत्ता और पैसे के नशे में चूर गुंडे थाने में दाखिल होते हैं, पत्रकार अमित पांडेय का गिरेबान पकड़ते हैं और उन पर लात-घूंसों की बरसात कर देते हैं। इस दौरान कानून के रखवाले मूकदर्शक बने रहे।
एसडीओपी ध्रुवेश जायसवाल की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप
इस कांड के बाद पत्थलगांव एसडीओपी ध्रुवेश जायसवाल की भूमिका पर उंगलियां उठ रही हैं। क्षेत्र में यह सवाल तेजी से तैर रहा है कि क्या अपराधियों में पुलिस का खौफ खत्म हो चुका है, या फिर यह पूरी घटना एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा थी? आरोप लगाया जा रहा है कि एक सोची-समझी रणनीति के तहत अमित पांडेय को थाने बुलाया गया था ताकि वहां पहले से घात लगाए बैठे गुंडे अपनी भड़ास निकाल सकें।
यह पहली बार नहीं है जब ध्रुवेश जायसवाल का नाम विवादों में आया है। उनके पिछले कार्यकाल भी विवादों से घिरे रहे हैं:
- बलरामपुर (वाड्रफनगर) कार्यकाल: यहाँ पदस्थापना के दौरान कोयला और रेत माफिया के गठजोड़ को उजागर करने वाले निर्भीक पत्रकारों पर जबरन फिरौती और रंगदारी के फर्जी मामले दर्ज करने के आरोप लगे थे, जिसकी जांच के निर्देश राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को देने पड़े थे।
- सरगुजा (अम्बिकापुर) कार्यकाल: पहाड़ी कोरवा आदिवासियों के हक के पैसों का गबन करने वाले एनजीओ और भ्रष्ट अधिकारियों को कथित संरक्षण देने के मामले में भी उनकी कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में रही थी।
रसूखदारों का सिंडिकेट: अवैध धंधे और चरित्र हनन का खेल
पत्थलगांव लंबे समय से बड़े और प्रभावशाली व्यापारियों का केंद्र रहा है। आरोप है कि यहाँ टैक्स चोरी, अवैध रेत-कोयला खनन, नकली बीज का कारोबार और फर्जी दस्तावेजों के दम पर करोड़ों की सरकारी व निजी जमीनों पर कब्जा करना एक संगठित उद्योग बन चुका है।
जब अमित पांडेय जैसे पत्रकारों ने इन काले कारनामों को उजागर किया, तो रसूखदारों ने पुलिस को अपनी ‘प्राइवेट सिक्योरिटी’ की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। जब वे पत्रकार के हौसलों को डिगा नहीं पाए, तो उन्होंने अमित पांडेय के चरित्र हनन की कोशिशें शुरू कर दीं और उन पर रंगदारी (Extortion) के झूठे केस लादने की धमकियां दी जाने लगीं।
राजनीतिक उदासीनता: सोशल मीडिया तक सिमटा विपक्ष
इस दर्दनाक घटना ने छत्तीसगढ़ की सियासत को भी बेनकाब कर दिया है। सत्ता पक्ष जहां इस मामले पर पूरी तरह घिर गया है, वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की भूमिका पर भी तीखे सवाल उठ रहे हैं।
केवल ‘ट्विटर’ तक सीमित रही कांग्रेस की जंग
जमीन पर उतरकर इस तानाशाही के खिलाफ एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा करने के बजाय कांग्रेस के बड़े नेता केवल अपने बंद कमरों में बैठकर सोशल मीडिया (X और फेसबुक) पर निंदा प्रस्ताव जारी करने तक सीमित हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन ‘सेठों’ और भू-माफियाओं के तार केवल सत्ता पक्ष से नहीं, बल्कि विपक्ष के नेताओं की जेबों से भी जुड़े हैं, जिसके कारण केवल औपचारिकता निभाई जा रही है।
टी.एस. सिंहदेव की चुप्पी पर गहराता सस्पेंस
छत्तीसगढ़ की राजनीति के कद्दावर नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव, जो इस समय प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (PCC Chief) की दौड़ में सबसे आगे माने जा रहे हैं, इस पूरे मामले पर पूरी तरह मौन हैं। सरगुजा संभाग उनका गृह क्षेत्र है और इसी संभाग के भीतर आने वाले मुख्यमंत्री के गृह जिले में इतनी बड़ी वारदात हो जाती है, लेकिन टी.एस. सिंहदेव की तरफ से कोई कड़ा रुख सामने नहीं आया है। जनता अब पूछ रही है कि क्या राजनीतिक पैंतरेबाज़ी और लॉबिंग के बीच शोषितों और पत्रकारों की चीखें दब गई हैं?
निष्कर्ष: अब फैसला जनता के हाथ में
पत्थलगांव की यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ जाएं, सत्ता के दलाल पुलिस थानों को नियंत्रित करने लगें और विपक्ष केवल सोशल मीडिया पर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझे, तब न्याय की उम्मीद सिर्फ और सिर्फ जनता की एकजुटता से बचती है। अमित पांडेय जैसे पत्रकारों की असली ताकत यह भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र नहीं, बल्कि वह आम जनता है जिसकी वे आवाज बनते हैं। अब देखना यह है कि क्या इस सुशासन के मुंह पर लगी कालिख को साफ करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर गाज गिरेगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन हो जाएगा।

