बलरामपुर : जिले से ग्रामीण विकास और स्वावलंबन की एक बेहद सुखद तस्वीर सामने आ रही है। कभी पानी की भारी किल्लत, सूखे कुओं के दंश और आजीविका की तलाश में होने वाले अनैच्छिक पलायन की मजबूरी से जूझने वाला विकासखंड शंकरगढ़ का ग्राम पंचायत लोधी आज जल संरक्षण की बदौलत आत्मनिर्भरता का एक नया मॉडल पेश कर रहा है। जिला कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी के कुशल निर्देशन में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत क्रियान्वित किए गए रणनीतिक जल संरक्षण कार्यों ने न केवल स्थानीय किसानों के सूखे खेतों की प्यास बुझाई है, बल्कि उनके सामाजिक और आर्थिक जीवन में भी एक नई उम्मीद और व्यापक खुशहाली का संचार किया है।
विकासखंड शंकरगढ़ के अंतर्गत आने वाले सुदूर ग्राम लोधी के निवासी किसान लवंगसाय की कहानी इस बड़े बदलाव का जीवंत प्रमाण है। कुछ वर्ष पहले तक लवंगसाय की पूरी खेती पूरी तरह से मानसूनी बारिश के भरोसे टिकी हुई थी। हर साल गर्मी का मौसम दस्तक देते ही गांव के कुएं और हैंडपंप पूरी तरह से सूख जाते थे, जिससे पेयजल के साथ-साथ निस्तारी की गंभीर समस्या खड़ी हो जाती थी। अनियंत्रित दोहन और वर्षा जल संचयन के अभाव में भूजल स्तर लगातार खतरनाक ढंग से नीचे जा रहा था। इतना ही नहीं, मानसून के दौरान भारी बारिश होने पर खेतों की सबसे उपजाऊ ऊपरी मिट्टी पानी के तेज बहाव के साथ बह जाती थी, जिससे भूमि की उत्पादकता भी प्रभावित हो रही थी।
सिंचाई के पर्याप्त और स्थाई साधनों का अभाव होने के कारण लवंगसाय और उनके जैसे अन्य ग्रामीणों के लिए खरीफ के बाद रबी की फसल लेना पूरी तरह से असंभव था। इस वजह से साल के करीब छह महीने ग्रामीण क्षेत्रों में कोई आर्थिक गतिविधि नहीं होती थी, और अंततः ग्रामीणों को अपनी आजीविका चलाने तथा परिवार के भरण-पोषण के लिए दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े महानगरों की ओर पलायन करना पड़ता था। कभी-कभी मानसून में देरी या कम वर्षा होने के कारण मुख्य फसल धान भी बर्बाद हो जाती थी, जिससे संकट और अधिक गहरा जाता था।
चुनौती को अवसर में बदल गया व्यक्तिगत डबरी निर्माण
इन अंतहीन चुनौतियों को स्थाई अवसर में बदलने का काम मनरेगा योजना के अंतर्गत स्वीकृत किए गए व्यक्तिगत डबरी (छोटा तालाब) निर्माण कार्य ने किया। प्रशासन द्वारा त्वरित कदम उठाते हुए किसान लवंगसाय के निजी खेत में 1 लाख 88 हजार रुपये की कुल लागत से डबरी निर्माण के कार्य को प्रशासनिक और तकनीकी मंजूरी प्रदान की गई। इस पूरे प्रोजेक्ट में स्थानीय ग्राम पंचायत लोधी को ही क्रियान्वयन एजेंसी बनाया गया, जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित हुई। जिला प्रशासन के तकनीकी अमले के कड़े मार्गदर्शन में मार्च 2026 में इस डबरी का निर्माण कार्य पूरी तरह से संपन्न कर लिया गया।
विशेष उपलब्धि: इस डबरी निर्माण कार्य के दौरान न केवल जल स्रोत तैयार हुआ, बल्कि निर्माण अवधि के भीतर ही गांव के ही जरूरतमंद ग्रामीणों को कुल 658 मानव दिवस (Man-days) का प्रत्यक्ष रोजगार भी प्राप्त हुआ। इसने संकट के समय ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर ही मजबूत आर्थिक संबल प्रदान किया।
डबरी का निर्माण कार्य पूरा होते ही गांव की भौगोलिक और आर्थिक तस्वीर तेजी से बदलने लगी है। चालू सीजन के दौरान वर्षा जल का बेहतर संग्रहण होने के कारण पूरे इलाके के भूजल स्तर (वाटर टेबल) में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। इसका सीधा असर यह हुआ कि डबरी के आसपास स्थित अन्य किसानों के निजी कुओं और सार्वजनिक हैंडपंपों में भी पानी की उपलब्धता साल भर बनी रहने लगी है।
फसल चक्र में क्रांतिकारी बदलाव और सिंचित क्षेत्र में ढाई गुना बढ़ोतरी
जल संचयन की इस प्रणाली ने स्थानीय स्तर पर परंपरागत फसल चक्र को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। पहले पानी की कमी के चलते लवंगसाय जैसे परंपरागत किसान केवल ज्वार, बाजरा या कोदो-कुटकी जैसी कम पानी वाली मोटे अनाजों की फसलें ही मजबूरी में उगा पाते थे। लेकिन अब खेत में ही पानी का स्थाई स्रोत उपलब्ध होने के कारण वे गेहूं, चना, सरसों तथा विभिन्न प्रकार की नगदी फसलों और हरी सब्जियों की व्यापक स्तर पर खेती कर रहे हैं।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस एक सफल प्रयास से किसान का कुल सिंचित क्षेत्र पहले के मात्र 2 एकड़ से बढ़कर अब सीधे 5 एकड़ तक पहुंच गया है, जो कि ढाई गुना से भी अधिक की बढ़ोतरी है। अब यहाँ के किसान खरीफ के साथ-साथ रबी और जायद यानी तीनों मौसमों में फसलें ले रहे हैं। बहु-फसलीय प्रणाली (Multi-cropping) अपनाने से किसानों की कृषि आधारित वार्षिक आय में भारी इजाफा दर्ज किया जा रहा है।
परियोजना का संकेतक बदलाव से पूर्व की स्थिति बदलाव के बाद (वर्तमान स्थिति)
कुल सिंचित क्षेत्र 2 एकड़ (केवल वर्षा आधारित) 5 एकड़ (स्थाई सिंचाई सुविधा)
फसलों के प्रकार केवल ज्वार-बाजरा और खरीफ धान गेहूं, चना, विभिन्न नगदी सब्जियां, रबी व जायद फसलें
पलायन की स्थिति 25 से अधिक परिवारों का नियमित पलायन पलायन पर पूरी तरह रोक, स्थानीय आजीविका
अतिरिक्त आय स्रोत शून्य / अनिश्चित मजदूरी मछली पालन (आगामी योजना) एवं सब्जी व्यापार
25 परिवारों का थमा पलायन, गांव में ही मिला सम्मानजनक जीवन
इस जल संरक्षण प्रयास का सबसे दूरगामी और मानवीय प्रभाव ग्रामीण समाज पर पड़ा है। विगत वर्षों में आजीविका और मजदूरी की तलाश में दिल्ली, हरियाणा और अन्य औद्योगिक शहरों की ओर रुख करने वाले गांव के लगभग 25 परिवारों का पलायन अब पूरी तरह से रुक गया है। अब ये सभी परिवार सम्मानजनक ढंग से अपने ही गांव और खेतों में कृषि तथा अन्य कृषि-आधारित आजीविका गतिविधियों के माध्यम से बेहतर जीवन यापन कर रहे हैं। उन्हें अब अपने बूढ़े माता-पिता या बच्चों को छोड़कर दूर देशों में असुरक्षित मजदूरी करने की आवश्यकता नहीं रह गई है।
सफलता की कहानी साझा करते हुए स्वयं किसान लवंगसाय बताते हैं कि डबरी बनने के बाद से उनके जीवन और खेती की संभावनाएं कई गुना बढ़ गई हैं। अब उन्हें धान की रोपाई करने के लिए मानसून की अनिश्चित मानसूनी बारिश का लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता। समय पर सिंचाई की पुख्ता सुविधा मिलने से कुल फसल उत्पादन में भारी वृद्धि हुई है। लवंगसाय ने आगे बताया कि वे अब इस पानी का बहुआयामी उपयोग करने जा रहे हैं, जिसके तहत आगामी बरसात के मौसम में वे डबरी में मत्स्य पालन (मछली पालन) शुरू करेंगे, जिससे उन्हें कृषि के अतिरिक्त एक बड़ी और निश्चित आय प्राप्त होने लगेगी।
आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम
कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी के मार्गदर्शन में बलरामपुर जिले के विभिन्न विकासखंडों में मनरेगा के माध्यम से चलाए जा रहे जल संरक्षण के ये सघन अभियान केवल प्राकृतिक संसाधनों को सहेजने का तकनीकी माध्यम नहीं हैं। वास्तव में यह जमीनी प्रयास ग्रामीण अंचलों में गरीबी उन्मूलन, किसानों की शुद्ध आय में वृद्धि, बड़े पैमाने पर स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और अंततः पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भीतर से सशक्त और पुनर्जीवित करने का एक बड़ा जरिया बन चुका है। ऐसे दूरदर्शी और सतत प्रयास निश्चित रूप से बलरामपुर जिले को जल-समृद्ध, कुपोषण मुक्त और आत्मनिर्भर जिला बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रहे हैं।

