आदेश के बाद भी प्रशासन मौन: आरटीआई के तहत सूचना देने का फरमान बेअसर, आवेदक को अब तक नहीं मिली कोई जानकारी

Deshkibaat24
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सूरजपुर : जिले के अंतर्गत जनपद पंचायत भैयाथान से एक ऐसा मामला सामने आया है, जो सूचना के अधिकार (RTI) कानून की जमीनी हकीकत और प्रशासनिक उदासीनता को उजागर करता है। प्रथम अपीलीय अधिकारी एवं मुख्य कार्यपालन अधिकारी (जनपद पंचायत भैयाथान) द्वारा आदेश पारित किए जाने के लंबा समय बीत जाने के बाद भी आज तक आवेदक को कोई जानकारी साझा नहीं की गई है। इस लापरवाही से स्पष्ट होता है कि जमीनी स्तर पर सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 का किस तरह मखौल उड़ाया जा रहा है।
क्या था पूरा मामला और अपीलीय आदेश?
प्राप्त आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, एक स्थानीय जागरूक नागरिक ने ग्राम पंचायत बुन्दिया से सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां मांगी थीं। निर्धारित समयावधि के भीतर जनसूचना अधिकारी एवं सचिव ग्राम पंचायत बुन्दिया द्वारा कोई जानकारी प्रदाय नहीं की गई। इसके बाद आवेदक ने आर.टी.आई. पोर्टल के माध्यम से 30 मार्च 2026 को प्रथम अपील आवेदन पत्र प्रस्तुत किया था (प्रकरण क्रमांक 92/2026)।
इस प्रकरण की सुनवाई 29 मई 2026 को दोपहर 12:00 बजे कार्यालय जनपद पंचायत भैयाथान में आहुत की गई थी। सुनवाई के दौरान जनसूचना अधिकारी/सचिव ग्राम पंचायत बुन्दिया उपस्थित हुए, जबकि आवेदक अनुपस्थित रहे। जब अपीलीय अधिकारी ने सचिव से जानकारी समय पर न देने का कारण पूछा, तो सचिव द्वारा शासकीय कार्यों की व्यस्तता और ऑनलाइन पोर्टल न देख पाने का अजीबोगरीब बहाना बनाया गया।
सुनवाई के दौरान प्रथम अपीलीय अधिकारी ने जनसूचना अधिकारी/सचिव ग्राम पंचायत बुन्दिया को सख्त निर्देश दिया था कि वे आवेदक द्वारा चाही गई सभी जानकारियां शासन के नियमानुसार ‘निःशुल्क’ प्रदान करना सुनिश्चित करें। इस निर्देश के साथ ही अपील आवेदन को नस्तीबद्ध (क्लोज) कर दिया गया था।
आदेश के बाद भी कोई पत्राचार नहीं, प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे सवाल
विस्मयकारी तथ्य यह है कि प्रथम अपीलीय अधिकारी के स्पष्ट और लिखित आदेश के बावजूद, ग्राम पंचायत प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है। आदेश पारित होने के बाद से लेकर आज तक संबंधित जनसूचना अधिकारी या ग्राम पंचायत बुन्दिया की ओर से आवेदक के साथ कोई भी आधिकारिक पत्राचार नहीं किया गया है। कानूनन बाध्य होने के बावजूद विभाग द्वारा कोई भी जानकारी या दस्तावेज साझा नहीं किए गए हैं।
यह स्थिति न केवल वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों की अवहेलना को दर्शाती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि स्थानीय स्तर पर अधिकारी जवाबदेही से पूरी तरह से भाग रहे हैं। व्यस्तता का बहाना बनाकर महीनों तक आरटीआई आवेदनों को दबाए रखना और अपीलीय आदेश के बाद भी चुप्पी साधे रखना सूचना के अधिकार कानून की मूल भावना की उपेक्षा है। अब देखना यह होगा कि इस घोर लापरवाही और आदेश की अवहेलना पर जिला प्रशासन आगे क्या कड़ा रुख अपनाता है।

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