हस्तशिल्प की जीवंत परंपरा से रूबरू हुए दतिमा के विद्यार्थी: तीन दिवसीय प्रदर्शन-सह-जागरूकता कार्यक्रम संपन्न

Deshkibaat24
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सूरजपुर : छत्तीसगढ़ की समृद्ध एवं सदियों पुरानी शिल्प परंपरा जब कक्षा की चारदीवारी से निकलकर विद्यार्थियों के सामने साकार हुई, तो देवी अहिल्या बाई पब्लिक स्कूल, दतिमा का परिसर कला और जिज्ञासा से भर उठा। वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के कार्यालय विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) के अंतर्गत संचालित हस्तशिल्प सेवा केन्द्र, जगदलपुर द्वारा विद्यालय परिसर में तीन दिवसीय हस्तशिल्प प्रदर्शन-सह-जागरूकता कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया।
प्रमुख हस्तशिल्प और सजीव प्रदर्शन
तीन दिनों तक चले इस विशेष आयोजन में विद्यार्थियों के समक्ष राज्य की चार प्रमुख लोक कलाओं का सजीव प्रदर्शन किया गया:
गोदना पेंटिंग: पारंपरिक शरीर कला से कैनवास और वस्त्रों पर उकेरी जाने वाली इस कला की बारीकियों को समझाया गया।
भित्तिचित्र (Mural Painting): दीवारों और कैनवास पर उकेरे जाने वाले पारंपरिक चित्रों की तकनीक का प्रदर्शन हुआ।
काष्ठ शिल्प (Woodcraft): लकड़ी पर नक्काशी और तराशने की कला का जीवंत प्रदर्शन किया गया।
ड्राई फ्लावर पेंटिंग: सूखे फूलों और प्राकृतिक सामग्रियों से कलाकृतियां बनाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।
सरगुजा, बिलासपुर एवं जशपुर सहित विभिन्न अंचलों से आए अनुभवी हस्तशिल्पियों ने अपने पारंपरिक कौशल का प्रदर्शन किया। शिल्पियों ने केवल कृतियाँ ही नहीं दिखाईं, बल्कि इन कलाओं की उत्पत्ति, लोक परंपरा, निर्माण प्रक्रिया, उपयोगिता तथा इनके संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर भी विस्तार से जानकारी दी।
विद्यार्थियों के लिए व्यावहारिक अनुभव
विद्यार्थियों ने पूरे उत्साह के साथ प्रदर्शन में भाग लिया और कारीगरों से सीधे संवाद कर निर्माण प्रक्रिया एवं तकनीकी पहलुओं को समझा। इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यह विद्यालय की नियमित शैक्षणिक गतिविधियों के साथ समानांतर रूप से आयोजित किया गया। इससे विद्यार्थियों को पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ राज्य की सांस्कृतिक विरासत को करीब से देखने और समझने का सीधा अवसर मिला।
सफल संचालन एवं नेतृत्व
कार्यक्रम का नेतृत्व सहायक निर्देशक मनोज राठी ने किया। वहीं, आयोजन को सुचारू एवं प्रभावी बनाने में विद्यालय के निर्देशक मुकेश अग्रवाल, राजू यादव तथा प्राचार्य संजीत कुमार सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शिक्षा और शिल्प विरासत का यह अनूठा समन्वय विद्यार्थियों के लिए एक प्रेरणादायक और अविस्मरणीय अनुभव साबित हुआ।

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